गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग

उत्तर प्रदेश सरकार

वैज्ञानिक गन्ना खेती की विधियां

गुड बनाने में ध्यान योग्य बातें

  • सामान्यतः 150 कि०ग्रा०/हे० नत्रजन से ऊपर दिये गये गन्ने से उत्तम किस्म का गुड नहीं बन पाता।
  • पेड व शरदकाल में बोये गन्ने से उत्तम गुड बनता है।
  • गिरे गन्ने, चूहों, सुअरों व गीदड से खाये हुये बीमारीयुक्त व की कीड प्रभावित गन्ने से उत्तम गुड नहीं बन पाता है ।
  • रसशोधकों में देवला, भिन्डी, सेमल की छाल, फालसा की दाल या सुखालाई की छाल का क्रमशः 150, 200, 250, 255 व 200 ग्राम प्रति कुन्तल के हिसाब से प्रयोग व रासायनिक पदार्थों जैसे -सोडियम हाईड्रोसल्फाइड, सोडियम कार्बोनेटव सुपर फास्फेट, चने का पानी व सज्जी आदि क्रमशः 40-45 ग्राम, 10-15 ग्राम, 500 मि०ली० व 1.5 लीटर प्रति 4 कुन्तल रस के शोधन के लिये उपयुक्त होता है।
  • फरवरी-मार्च में तैयार किये गुड को ही भण्डारित करना चाहिये।

गुड़ का अच्छा परता कैसे लें?

गुड का अच्छा (रिकवरी) पाने के लिये किसान एवं गुड उत्पादक निम्नलिखित बातों पर ध्यान दें।

  • पेराई के पहले कोल्हू के सभी बेलनों की सफाई, खांचें (ग्रूव) गियर एवं बैरिंग सहीं कर लें।
  • कोल्हू के रस निष्कसन क्षमता की जॉच कर लें। बैल चलित कोल्हू से लगभग 65 एवं पावल चालित कोल्हू से लगभग 70 प्रतिशत तक रस निकाला जा सकता है।
  • यदि कोल्हू उत्पादक को संस्तुति उपलब्ध न हो तो अगले बैलनों के बीच 6 मि.मी. एवं पिछले बेलनो के बीच 1 मि.मी. की दूरी रखें।
  • क्षमतानुसार गन्ने का संतुलित भरण (फीडिंग) करें। कोल्हू को अनावश्यक कसने एवं गन्ना कम लगाने से कोल्हू जल्द खराब होता है। कोल्हू के स्नेहन (लुब्रीकेशन) का ध्यान रखें।