गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग

उत्तर प्रदेश सरकार

वैज्ञानिक गन्ना खेती की विधियां

बावग फसल की कटाई एवं सूखी पत्ती का जलाना

उन्नतशील गन्ना जातीयों जैसे को०शा० 88230, 8436, 95255, 96268, 88296, 90269, 92263, 94257, 94270, 95222, 97264 को०से० 92423, 95422 व यू०पी० 39 के बावग गन्ने की मेडें गिराने के उपरन्त फरवरी, मार्च में भूमि की सतह से काटने पर (नवम्बर+दिसम्बर) शरदकालीन में काटी गई फसल की तुलनामे अच्छी पेडी होती है। यद्यपि अप्रैल-मई के बाद काटी गई फसल की पेडी अच्छी नहीं होती है फिर भी यह शरदकाल में काटी गई बावग की पेडी से अच्छी उपज देती है। पौधा गन्ना की कटाई भूमि की सतह से ही करनी चाहिये ताकि ठूंठों की अग्रभाग की कोई ऑंख ऊपर न रहने पाये। उपयुक्त समय से कटाई करने की दशा में पेडी के पहले से निकले बडे कल्लों को भी काट देना चाहिये जिससे पेडी की वृद्धि में समरूपता रहे। बावग गन्ने की देर से कटाई की स्थिति में पहले से निकले कल्लों को छोडना लाभकारी पाया गया है। कीट एवं रोगो से बचाव के लिये बावग की कटाई के तुरन्त बाद खेत में सूखी पत्ती को समरूप बिखेर कर जला देना चाहिये।

मेड़ गिराना, ठूंठों की छंटाई सिंचाई एवं खाद

सूखी पत्ती जलाने के बाद 24 घण्टे के अन्दर पानी लगा देना चाहिये तदोपरान्त मेंडे गिराना चाहिये। पेड के समरूप फुटाव के लिये भूमि की सतह से ठूंठों की छंटाई करना आवश्यक है। यह कार्य किस तेजधार वाले औजार से करना चाहिये ताकि ठूंठ उखड ने न पाये और अनावश्यक रूप से उनके टुकडे-टुकडे न हो जाये। खेत मे यदि उपयुक्त नमी हो तो बावग की कटाई के तुरन्त बाद मेडे गिराकर ठूंठों की छटाई कर देनी चाहिये जिससे स्वतंत्र एवं समरूप फुटाव हो सके। मेडों के किनारों को देशी हल से जोत देना चाहिये ताकि पुरानी जडें नष्ट हो जाये एवं जडे विकसित हो सके।

अच्छी पेड फसल लेने के लिये प्रारम्भ में नत्रजन की अधिक मात्रा देनी आवश्यक है। मेड गिराने समय कि०ग्रा० नत्रजन/हेक्टयेर मेडों के दोनो ओर देशी हल से बनाई गई नालियों में तथा शेष 90 कि०ग्रा० नत्रजन मई माह में देनी चाहिये। पंक्तियो के मध्य गहरी जुताई करने से मृदा की दशा भी अच्छी हो जाती है तथा पुरानी जड भी नष्ट हो जाती है।

सिंचाई

ग्रीष्म ऋतु में 15-20 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिये। कम वर्षा अथवा खण्ड वर्षा वाले क्षेत्रों में मानसून काल में तथा मानसून के उपरान्त भी सिंचाई करते रहना चाहिये।

रिक्त स्थानों की भराई

पौधों की संख्या रखने के उद्देश्य से पालीबैग विधि तैयार पौधे अथवा पूर्व-अंकुरित टुकडों अथवा विकसित थानों से रिक्त स्थानों का भराव सिंचाई के समय करना चाहिये। रिक्त स्थानों वाली फसल निशिचत रूप से कम उपज देती है। यदि दो थानों के मध्य 45 से०मी० की दूरी हो तो उसे खाली समझकर अवश्य भर देना चाहिये।

कर्षण क्रियायें

खेत को खर-पतवार से मुक्त रखने एवं मृदा नमी संरक्षण के उद्देश्य से प्रत्येक सिंचाई के बाद गुड़ाई करना चाहिये। सूखी पत्ती बिछाकर खरपतवार नियंत्रण साथ ही नमी भी सुरक्षित की जा सकती है। फसल को गिरने से बचाने के लिये गन्ने के बढ वार अनुसार जुलाई, अगस्त में मिट्‌टी चढ़ना, प्रत्येक थान को दो ऊॅंचाईयों पर बांधन एवं अगस्त के अन्तिम सप्ताह में त्रिकोणात्मक बंधाई करना आवश्यक है।

कटाई

चूंकि पौधा फसल की तुलना में पेडी शीघ्र पक जाती है, अतः जहॉं तक सम्भव हो नवम्बर में ही मेडे गिराने के बाद पेडी की कटाई प्रारम्भ कर देनी चाहिये।

अतिशीतकाल में पेडी

शरदकालीन में काटी गई बावग फसल में कम फुटाव के कारण पेडी अच्छी नहीं होती। अतः जिन खेतों में पेडी रखना हो उसकी बावग फसल फरवरी से पहले नहीं काटनी चाहियें। यदि फरवरी से पहले काटनी पडे तो कटाई के उपरान्त २० से०मी० मोटी सूखी पत्तियों की परत ठूंठों के ऊपर बिछा देनी चाहिये।

गुड़ उत्पादन हेतु गन्ने की उन्नतिशील जातियॉं

उत्तम किस्म का गुड प्राप्त करने हेतु गुड बनाने के प्रारम्भिक काल (अक्टूबर-नवम्बर) में को०शो० 88230 को०शो० 8336, को०शा० 96258, को०शा० 95268 तथा उसके उपरान्त गुड बनाने हेतु को०शा० 767, 8432, 95222, 90269, 92263, 94257, 94270, 97264 को०से० 92423, 95422 व यू०पी० 39 जातियों का चयन किया जाना चाहिये।