गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग

उत्तर प्रदेश सरकार

वैज्ञानिक गन्ना खेती की विधियां

उर्वरक

गन्ना फसल के लिये आवश्यक पोषक तत्वों में नत्रजन का प्रभाव सर्वविदित है। पोटाश और फास्फोरस का प्रयोग मृदा के उपरान्त कमी पाये जाने पर ही किया जाना चाहिये। अच्छी उपज के लिये गन्ने में 150 से 180 कि०ग्रा०/हे. प्रयोग करना लाभप्रद पाया गया है। नत्रजन की कुल मात्रा का 1/3 भाग व कमी होने की दशा में 60-80 कि०ग्रा० फास्फोरस एवं 40 कि०ग्रा० पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के पूर्व कूडों में डालना चाहिये। नत्रजन के शेष 2/3 भाग को दो हिस्सों में बराबर-बराबर जून से पूर्व ब्यांतकाल में प्रयोग करना चाहिये।

मृदा की भौतिक दशा सुधारने, मृदा से हयूमस स्तर बढ़ाने व उसे संरक्षित रखने, मृदा में सूक्ष्म जीवाणु गतिविधियों के लिये आदर्श वातावरण बनाये रखने के साथ ही निरन्तर फसल लिये जाने, रिसाव व भूमि क्षरण के कारण मृदा में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के उद्देश्य से हरी खाद, एफ.वाइ.एम. कम्पोस्ट, सडी प्रेसमड आदि का प्रयोग किया जाना चाहिये। इस प्रकार जैविक खाद देने से गन्ना फसल के लिये आवश्यक पोषक तत्वों की अधिकांश मात्रा की पूर्ति की जा सकती है। मृदा में जैविक तत्वों की पूर्ति के लिये हरी खाद पूरक है। हरी खाद के लिये शीघ्र बढ ने वाली दलहनी फसलों जैसे सनई, ढैंचा, लोबिया आदि को चुनना चाहिये तथा खड़ी फसल के औसत बढ तवार के उपरान्त (45 से 60 दिन परद्ध खेत में पलटकर मिट्‌टी में पूरी तरह सड ने देना चाहिये। हरी खाद विशेषतः जब दलहनी फसलों के माध्यम से दी जाती है तो मृदा में यह जैविक तत्वों के साथ ही नत्रजन की वृद्धि भी करती है। मृदा में जैविक तत्वों की पूर्ति के लिये हरी खाद पूरक है। हरी खाद के लिये शीघ्र बढ ने वाली दलहनी फसलों जैसे सनई, ढैंचा, लोबिया आदि को चुनना चाहिये तथा खड ी फसल के औसत बढ तवार के उपरान्त (45 से 60 दिन परद्ध खेत में पलटकर मिट्‌टी में पूरी तरह सड ने देना चाहिये।

हरी खाद विशेषतः जब दलहनी फसलों के माध्यम से दी जाती है तो मृदा में यह जैविक तत्वों के साथ ही नत्रजन की वृद्धि भी करती है। दलहन की जड में बैक्टीरिया वातावरण से नत्रजन लेकर उसे पौधे के उपयोग में लाये जाने योग्य नत्रजन में परिवर्तित कर देते हैं। हरी खाद के रूप में उपयोग हेतु एक हेक्टयर क्षेत्रफल में उगाई गई फसल में 8 से 25 टन तक हरी खाद मिलती है जो मृदा में पलटने के उपरान्त लगभग 60 कि०ग्रा० नत्रजन/हे. दे देती है। हरी खाद से प्राप्त यह नत्रजन की मात्रा 10 टन एफ.वाई.एम. प्रति हेक्टयर देने पर प्राप्त होने वाली मात्रा के समकक्ष होती है। यदि भूमि में सूक्ष्म तत्वों जस्ता, लोहा, मैग्नीशियम, गन्धक आदि की कमी हो तो उनका प्रयोग भी संस्तुत मात्रा के अनुसार किया जा सकता है।

गन्ने के साथ अन्तः फसल

गन्ना के साथ अन्तः खेती के लिये उन्हीं फसलों का चुनाव करना चाहिये जिनमें तृद्धि प्रतिस्पर्धा न हो तथा जिनकी छाया से गन्ना फसल पर विपरीत प्रभाव न पड़े। फसलों के उचित जातीय चयन और उन्नत कृषि तकनीकी अपनाकर ही अन्तः खेती फसल प्रणाली से भरपूर लाभ लिया जा सकता है। कृषि निवेशों की उपलब्धता के अनुसार आलू, लाही, राई, गेहॅं, मटर (फली) मसूर, प्याज, लहसुन आदि शरदकालीन गन्ने के साथ तथा उर्द, मूंग, लोबिया (चारा) और भिण्डी आदि बसन्तकालीन गन्ने के साथ दो पंक्तियों के मध्य अन्तः फसल के रूप में बोई जा सकती है। शरदकालीन एकाकी गन्ने एवं क्रमागत दो फसलों जैसे-आलू-गन्ना, मटर-गन्ना, गेहूं-गन्ना और लाही गन्ना की अपेक्षा गन्ना+आलू,एक पंक्ति, गन्ना+मटर(फली) 3पंक्ति गन्ना+गेहूं (2-3पंक्ति) एवं गन्ना लाही (२पंक्ति) लेना आर्थिक दृष्टिकोण से अधिक लाभप्रद पाया गया है। शरदकालीन गन्ने के साथ शरदकालीन सब्जियों एवं मसालों की अन्तःखेती भी लाभप्रद पाई गई है। गन्ना+लहसुन अन्तः फसल प्रणाली में अन्तः फसल के अतिरिक्त गन्ना फसल की उपज एकाकी गन्ना की तुलना में लगभग 8-10 प्रतिशत अधिक प्राप्त होती है।

पेड प्रबन्ध

गन्ने की पेड फसल लेना आर्थिक दृष्टिकोण से काफी लाभदायक है क्योंकि बावग फसल की तुलना में इसमें खेत की तैयारी, बीज तथा बुवाई का खर्च बच जाता है। पेडी की उत्पादकता बावग के समकक्ष तक बढई जा सकती है। यदि बावग की कटाई भूमि सतह से समय पर कर ली जाय, भरपूर खाद व पानी दिया जाय और रिक्त स्थानों की भराई कर ली जाय।

गन्ने की सफल पेड़ी के लिये आवश्यक कारक

  • पेड के लिये अच्छी बावग फसल होना।
  • भूमि की सतह से बावग गन्ने की कटार्र्ई।
  • नीचे की आंखों अथवा ठूंडों से अच्छा जमाव प्राप्त करने हेतु ठूंठों की छंटाई।
  • रिक्त स्थानों का भराव व समय से सिंचाई।
  • भरपूर खाद।
  • बावग फसल की समय से कटाई।
  • उचित समय फसल सुरक्षा उपाय।
  • अच्छी पेड क्षमता वाली गन्ना जाति का चयन।