गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग

उत्तर प्रदेश सरकार

वैज्ञानिक गन्ना खेती की विधियां

द्धरासाक्रप्रत्त्कत्रण कृ

  • सिमैजीन (50 डब्लू) रू. 2.24 कि०ग्रा०/हेक्टेयर एवं 2.4-डी.2.24 कि०ग्रा०/हे० की दर से जमाव पूर्व व जमाव के उपरान्त प्रयोग करें।
  • आईसेप्लेनोटाक्स (67 :) रू. मोथा एक बीजपत्रीय खरपतवारों के प्रभावी सुनियंत्रण हेतु 3 कि०ग्रा०/हे० की दर से जमाव पूर्व व पश्चात छिड़कना चाहिये।
  • एट्राजीन व 2-4 रू. एट्रजीन 2.24 कि०ग्रा०/हे० जमाव पूर्व तथा 2-4-डी-2.24 कि०ग्रा०/हे० जमाव पश्चात छिडकने से अधिकांश एकबीजपत्रीय व द्विबीजपत्रीय नष्ट हो जाते हैं।
  • 2-4-डी-2.24 (80): सोडियमसाल्ट) रू. शरदकालीन गन्ने मे चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु 2-4-डी-2.24 कि०ग्रा० प्रति हे० की दर से जमाव पश्चात छिडकना प्रभावशाली माना गया है।

रासायनिक/यांत्रिक नियन्त्रण

गन्ने के जमाव पूर्व सिमैजीन 2.24 कि०ग्रा०/हे० एवं गन्ने के सक्रिय ब्यांतकाल में अर्थात मई के अन्तिम सप्ताह में गुडाई के उपरान्त इतनी ही सिमैजीन का छिड काव करने से अकेले रसायन के छिडकाव करने की तुलना में अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।

रसायनों के छिड़काव में विशेष सावधानियॉं

  • रसायन की संस्तुत मात्रा को 1125 लीटर पानी घोलना चाहिये।
  • जमाव पूर्व रसायन प्रयोग करने से पहले गन्ने की एक अच्छी गुड ई कर देनी चाहिये।
  • रसायन छिड काव के समय खेत में पर्याप्त नमी हो।
  • जमाव पूर्व एवं पश्चात खरपतावार नियन्त्रण रसायनों का छिडकाव, गन्ना बुवाई के उपरान्त क्रमशः 7-15 दिन व 50-65 दिन के अन्दर करना चाहिये।

मिश्रित खेती की दशा में अन्य संवेदनशील फसलों को बचाने के उद्देश्य से खरपतवार नियंन्त्रक रसायनो का छिडकाव नहीं करना चाहिये।

मिट्‌टी चढना

गन्ने के थानो की जड पर मिट्‌टी चढने से जड़ों का सघन विकास होता है। इससे देर से निकले कल्लों का विकास रूक जाता और वर्षा ऋतु में फसल गिरने से बच जाती है। मिट्‌टी चढने से स्वतः निर्मति नालियॉं वर्षा में जल निकास का कार्य भी करती है। अतः अन्तिम जून में एक बार हल्की मिट्‌टी चढना तथा जुलाई में अन्तिम रूप से पर्याप्त मिट्‌टी चढकर गन्ने को गिरने से बचाकर अच्छी फसल ली जा सकती है।

बॅंधाई

अधिक उर्वरक दिये जाने तथा उत्तम फसल प्रबन्ध के कारण फसल की बढ़वार अच्छी हो जाती है, किन्तु जब गन्ने २.५ मीटर से अधिक लम्बे हो जाते हैं तो वे वर्षाकाल में गिर जाते हैं जिससे उसके रसोगुण पर विपरीत प्रभाव पड जाता है। अतः गन्ने के थानों को गन्ने की सूखी पत्तियों से ही लगभग 100 से०मी० ऊॅंचाई पर जुलाई के अन्तिम सप्ताह में तथा दूसरी बॅंधाइ्र अगस्त में पहली बॅंधाई से 50 से०मी० ऊपर तथा अगस्त के अन्त में एक पंक्ति के दो थान व दूसरी पंक्ति के एक थान से और इस क्रम को पलटते हुये त्रिकोणात्मक बॅंधाई करनी चाहिये।

सर्पिलाकार बॅंधाई

इस विधि में गन्ने के प्रत्येक थान के दो ओर सूखी व हरी पत्त्यिों को मिलाकर दो रस्सी बनाई जाती है, जिनके दिशाक्रम को उलटते हुये एक ही पंक्ति से आगे के सभी थान इस प्रकार बांध दिये जाते हैं जैसे किसी रस्सी को बुनावट में वरतल के मध्य पूरा थान फंसा हो। चूंकि इस बंधाई में एक पंक्ति का दूसरी पंक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं होता। इसलिये खेत में हवा आसानी से आर-पार हो जाती है तथा पंक्ति के सभी थान एक दूसरे से बंध जाते हैं। फसल की अच्छी बढ तवार होने पर यह बॅंधाई आवश्यकतानुसार विभिन्न ऊचाइयों पर दो या तीन जगह की जा सकती है।

सिंचाई

उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में गन्ना फसल को 1500 से 1750 मि०ली० पानी की आवश्यकता होती है जिसका औसतन 50 प्रतिशत वर्षा से प्राप्त होता है, शेष 50 प्रतिशत सिंचाई से पूरा किया जाता है। प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में 4-5 तथा पशिचमी क्षेत्र में 6-7 सिंचाई (2 सिंचाई वर्षा उपरान्त) करना लाभप्रद पाया गया है। नमी की कमी की दशा में बुवाई के 20-3- दिन के बाद एक हल्की सिंचाई करने से अपेक्षाकृत अच्छा जमाव होता है। ग्रीष्म ऋतु में 15-20 दिनों के अन्तर पर सिंचाई करते रहना चाहियेैं। वर्षाकाल में गन्ने की बढ़तवार होती है। अतः 20 दिन तक वर्षा न होने पर एक सिंचाई करना उपयोगी पाया गया है। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल की सामान्य एवं समुचित सिंचाई के लिये लगभग 200000 गैलन (88.9 ह.मि.ली.) पानी की आवश्यकता होती है। खेत में सतह से 8.9 से०मी० ऊपर तक पानी होने से वह मात्रा पूरी हो जाती है।

सीमित सिंचाई साधनों की स्थिति में यदि एक सिंचाई सम्भव हो तो मई माह में, यदि दो सिंचाई सम्भव हो तो क्रमशः अप्रैल, मई व जून माह में करनी चाहिये, इससे सर्वाधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। सूखी पत्ती बिछाकर नमी को सुरक्षित रखना उपज के दृष्टिकोण से लाभप्रद पाया गया है।