गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग

उत्तर प्रदेश सरकार

वैज्ञानिक गन्ना खेती की विधियां

फसल चक्र

एक निश्चित भू-भाग पर निश्चित समय में भूमि की उर्वरता को बिना क्षति पहुंचाये, कम से कम व्यय करके क्रमबद्ध फसलें उगाकर अधिकतम लाभ अर्जित करने की प्रक्रिया को फसल चक्र कहते हैं।

आदर्श फसल-चक्र वह है जो परिवार के सदस्यों एवं क्षेत्र के श्रमिकों को रोजगार के अधिकतम अवसर प्रदान कर सके तथा कृषि यंत्रों के आर्थिक दृष्टिकोण से लाभप्रद उपभोग के साथ ही कम से कम समय में अधिकतम उत्पादन सुनिश्चित कर सके। गन्ना फसल के साथ उत्तर प्रदेश में प्रचलित कुछ आदर्श चक्र निम्न प्रकार है:-

पश्चिमी क्षेत्र

  • चाय-लाही-गन्ना-पेड़ी़+लोबिया(चारा), गेहूँ
  • धान-बरसीम-गन्ना-पेड़ी+लोबिया(चारा)
  • धान-गेहूँ-गन्ना पेड़ी-गेहूँ-मूंग

मध्य क्षेत्र

  • धान-राई-गन्ना-पेड़ी-गेहूँ
  • हरी खाद-आलू-गन्ना-पेड़ी-गेहूँ
  • धान-गेहूँ-गन्ना-पेड़ी+लोबिया(चारा)

पूर्वी क्षेत्र

  • धान-लाही-गन्ना-पेड़ी-गेहूँ
  • धान-गन्ना-पेड़ी-गेहूँ
  • धान-गेहूँ-गन्ना-पेड़ी+लोबिया(चारा)

खेत की तैयारी

दोमट भूमि जिसमें गन्ने की खेती सामान्यत: की जाती है, में 12 से 15 प्रतिशत मृदा नमी अच्छे जमाव के लिये उपयुक्त है। यदि मृदा नमी में कमी हो तो इसे बुवाई से पूर्व पलेवा करके पूरा किया जा सकता है। ओट आने पर मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई तथा 2-3 उथली जुताइयॉं करके खेत में पाटा लगा देना चाहिये। खेत में हरी खाद देने की ​स्थिति में खाद को सड़ने के लिये पर्याप्त समय (लगभग एक से डेढ़ माह) देना चाहिये।

बुवाई का समय

गन्ने के सर्वोत्तम जमाव के लिये 30-35 डिग्री से0 वातावरण तापक्रम उपयुक्त है। उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में तापक्रम वर्ष में दो बार ​सितम्बर-अक्टूबर एवं फरवरी, मार्च आता है।

मौसम

बुवाई का समय

1 शरद 15 सितम्बर से अक्टूबर
2 बसन्त   
1) पूर्वी क्षेत्र  15 जनवरी से फरवरी 
2) मध्य क्षेत्र  15 फरवरी से मार्च
3) पश्चिमी क्षेत्र 15 फरवरी से मार्च
3 विलम्बित समय अप्रैल से 16 मई